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Subzero Afterlife Gupta ji Boss of the bosses

Old school Hip Hop rap , पंची 808s, डिस्को फंक, सिंथवेव तत्व, औद्योगिक धड़कनें, डार्कसिंथ, दमदार बास, ढोल समूह, अलौकिक परिवेश, बास संचालित, गहरी बासलाइन, तीव्र मजबूती , काव्यात्मक पॉप, डिस्को संगीत, ट्रैप सोल, डार्क डिस्को, मार्चिंग ड्रम, सूफी soul, सूफी लिक्विड phonk, डेस्टिनी डांस , रैप बास, लैटिन ट्रैप, पुर्तगाली, स्ट्रिंग अनुभाग, कठोर प्रवाह, रोलैंड टीआर-808 ड्रम मशीन, मैश अप, ट्रैप बीट्स, मिलनसार, सोवियत सिंथपॉप

Gupta ji Boss of the bosses·4:04

Lyrics


“अजीब है नमाज़–ए–मोहब्बत
का सिलसिला " इक़बाल "
कोई क़ज़ा करके रोया 😢,
कोई अदा करके रोया 😢…।”
"


अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला
हम ने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला

एक बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा
जिस तरफ़ देखिए आने को है आने वाला

उस को रुख़्सत तो किया था मुझे मा'लूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला

दूर के चाँद को ढूँडो न किसी आँचल में
ये उजाला नहीं आँगन में समाने वाला

इक मुसाफ़िर के सफ़र जैसी है सब की दुनिया
कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला

कुछ दूर साथ गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर गई
फिर उस के बा'द ज़िंदगी जाने किधर गई

अपनों की बेवफ़ाई बड़ा काम कर गई
इस आग में हयात तपी और निखर गई

बेदारी-ए-बहार-ए-नज़र ही की देर थी
फिर जो भी चीज़ सामने आई सँवर गई

अब कोसता हूँ पुख़्तगी-ए-तजरबात को
जो मुझ को हर अज़ीज़ से बेगाना कर गई

अल्लाह रे जुनून-ए-तजस्सुस के मरहले
मेरी निगाह तुझ पे भी हो कर गुज़र गई

उस पर नज़र उठा के मैं 'नाज़िश' जो रुक गया
महसूस हो रहा है कि दुनिया ठहर गई

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है

न शो'ले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोख़-ए-तुंद-ख़ू क्या है

ये रश्क है कि वो होता है हम-सुख़न तुम से
वगर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़ी-ए-अदू क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारे जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिस के लिए हम को हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्क-बू क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार
ये शीशा ओ क़दह ओ कूज़ा ओ सुबू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है

हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है
तेरी ख़ुश्बू का पता करती है
मुझ पे एहसान हवा करती है

चूम कर फूल को आहिस्ता से
मो'जिज़ा बाद-ए-सबा करती है

खोल कर बंद-ए-क़बा गुल के हवा
आज ख़ुश्बू को रिहा करती है

अब्र बरसे तो इनायत उस की
शाख़ तो सिर्फ़ दुआ करती है

ज़िंदगी फिर से फ़ज़ा में रौशन
मिशअल-ए-बर्ग-ए-हिना करती है

हम ने देखी है वो उजली साअ'त
रात जब शेर कहा करती है

शब की तन्हाई में अब तो अक्सर
गुफ़्तुगू तुझ से रहा करती है

दिल को उस राह पे चलना ही नहीं
जो मुझे तुझ से जुदा करती है

ज़िंदगी मेरी थी लेकिन अब तो
तेरे कहने में रहा करती है

उस ने देखा ही नहीं वर्ना ये आँख
दिल का अहवाल कहा करती है

मुसहफ़-ए-दिल पे अजब रंगों में
एक तस्वीर बना करती है

बे-नियाज़-ए-कफ़-ए-दरिया अंगुश्त
रेत पर नाम लिखा करती है

देख तू आन के चेहरा मेरा
इक नज़र भी तिरी क्या करती है

ज़िंदगी भर की ये ताख़ीर अपनी
रंज मिलने का सिवा करती है

शाम पड़ते ही किसी शख़्स की याद
कूचा-ए-जाँ में सदा करती है

मसअला जब भी चराग़ों का उठा
फ़ैसला सिर्फ़ हवा करती है

मुझ से भी उस का है वैसा ही सुलूक
हाल जो तेरा अना करती है

दुख हुआ करता है कुछ और बयाँ
बात कुछ और हुआ करती है

Gupta Ji Boss of bosses
cosmic जोन
गजल के गुलामों का बॉस कौन
सूफी शायरी रीमिक्स का बॉस कौन
ग़ालिब के काबिल कौन
रजिया का सुल्तान कौन
मोनिका डार्लिंग की जान कौन
सलमा का इंतजार कौन
नगमा की रफ्तार कौन
एक ही बॉस, एक ही बॉस
गुप्ता जी बॉस -gupta ji Boss
Boss of bosses Boss of bosses
Gupta Ji Boss गुप्ता जी बॉस



तू हमें सोच भी ले तो, बॉस
ख़ामोशी तेरी हम सारी पढ़ लेंगे... बॉस ऑफ बॉसेज
तू एक क़दम तो बढ़ा, बॉस
बाकी का सफर हम तय कर लेंगे बॉस ऑफ बॉसेज बॉस -gupta ji Boss गुप्ता जी बॉस


“अजीब है नमाज़–ए–मोहब्बत
का सिलसिला " इक़बाल "
कोई क़ज़ा करके रोया 😢,
कोई अदा करके रोया 😢…।”
"


अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला
हम ने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला

एक बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा
जिस तरफ़ देखिए आने को है आने वाला

उस को रुख़्सत तो किया था मुझे मा'लूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला

दूर के चाँद को ढूँडो न किसी आँचल में
ये उजाला नहीं आँगन में समाने वाला

इक मुसाफ़िर के सफ़र जैसी है सब की दुनिया
कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला

कुछ दूर साथ गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर गई
फिर उस के बा'द ज़िंदगी जाने किधर गई

अपनों की बेवफ़ाई बड़ा काम कर गई
इस आग में हयात तपी और निखर गई

बेदारी-ए-बहार-ए-नज़र ही की देर थी
फिर जो भी चीज़ सामने आई सँवर गई

अब कोसता हूँ पुख़्तगी-ए-तजरबात को
जो मुझ को हर अज़ीज़ से बेगाना कर गई

अल्लाह रे जुनून-ए-तजस्सुस के मरहले
मेरी निगाह तुझ पे भी हो कर गुज़र गई

उस पर नज़र उठा के मैं 'नाज़िश' जो रुक गया
महसूस हो रहा है कि दुनिया ठहर गई

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है

न शो'ले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोख़-ए-तुंद-ख़ू क्या है

ये रश्क है कि वो होता है हम-सुख़न तुम से
वगर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़ी-ए-अदू क्या है

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारे जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिस के लिए हम को हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्क-बू क्या है

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार
ये शीशा ओ क़दह ओ कूज़ा ओ सुबू क्या है

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है

हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू

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