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Jai Adivasi Lyric: RONNIE TANTI Tune by: RONNIE TANTI Music Composed by: RONNIE TANTI

male vocals, rap, electronic, guitar

RONNIETANTI😎·4:12

Lyrics

Title: "जय आदिवासी"

Jai Adivasi

शैली: हिंदी जागरूक रैप × लोक ढोल × राजनीतिक वास्तविकता

Lyric: RONNIE TANTI

हाँ…

असम की मिट्टी से आवाज उठ रही...

उन लोगों की…

जिनहोने असम को सुनहरा बनाया,

पर अभी तक अपना हक नहीं पाया...

आज बोलेंगे...

जय आई असम... जय आदिवासी...

असम के चाय बागान में काम करते जो भाई,

सदियों से गम उठे, पर पहचान न पाई।

सवाल ये उठता—सरकार क्यों घबराती?

एसटी का दर्जा उनका हक है, क्यों नहीं दिलाती?

बोले-भले लोगों को बहला-फुसला के लाये,

दूर देश से, दूर गाँव से, सपने सब गाएँगे।

क्यों पूछता नहीं कोई उनकी रात का दर्द?

उनके जीने का अधिकार का फ़र्ज़ क्यों मुश्किल है?

असम की चाय, ऊन के कपडे और शान,

उनको बनाने में उनका पसीना, उनका प्राण।

पर इज़्ज़त का कागज आज भी हाथों से दूर,

क्यों उनकी पहचान इतनी लगती है मजबूर?

हक उनका- रोकेगा कौन?

एसटी का दरजा—जन्म से उनका काम!

असम का सोना, उनकी मेहनत से चमका,

पर उनकी जिंदगी का दर्द किसने समझा?

पासुन पचास रुपया—उनका हक, उनकी रोटी,

ज़मीन के कागज़—उन लोगों की ही होती सोती।

आज सरकार सुन, आवाज़ उठी ज़ोर से,

आदिवासियों को अधिकार- ये फैसला हो तोर से!

असम के रास्ते उनकी थकन को जानते हैं,

पर सरकार के कागजों में लोग क्यों अंजाने?

सुनहरे असम का नाम दुनिया में घूमे,

पर उनकी पहचान के सागर क्यों रोये झूमे?

हम सब जानते हैं—एसटी उनका हक पूरा,

कहीं लिखा नहीं, पर इतिहास से है जुदा।

आज भी चाय बागान की मिट्टी उनको पुकारो,

“बेटा, तुझसे ही चलती असम की धार!”

बराबर वेतन उनकी सिर्फ पैसा-पचास रुपया,

क्या ये नया भारत का सपना हो सकता है भैया?

अधिकार देने को सरकार बार-बार क्यों सोचती है?

इनके बिना तो रुक जाएगा पूरा बाजार।

हक उनका- रोकेगा कौन?

एसटी का दरजा—जन्म से उनका काम!

असम का सोना उनकी गावै,

उनकी आवाज को क्यों ना मिले सुनवाई?

उनके बच्चे स्कूल का सपना लेकर सोते,

पर काल की लेखनी उनसे सब कुछ छूट जाती है।

ज़मीन के कागज़ भी उनका जन्म-कर,

फिर क्यों अधिकार का ये सिलसिला बेकार?

हम सबकी तरह उनका भी जीना हक से,

पर उनकी जिंदगी क्यों नपे-तुले वक्त से?

जिस हाथ ने चाय की महक तुम्हें दी,

हमारे हाथ को क्यों मिली बस मजदूर की जिंदगी?

आज आवाज उठ रही- गांव से शहर तक,

आदिवासियों का हक पूरा दो, बिना किसी डर तक।

जय आई असम- ये मिट्टी उनकी है,

जय आदिवासी- ये लड़ी उनकी नहीं, हम सब की है।

असम की राग में उनकी धड़कन बसी,

उनके बिना कोई भी काम नहीं होता.

सरकार सुन- ये वक़्त फ़ैसले का,

अधिकार देना—ये हक जिंदगी का...

हाँ…

हक उनका- रोकेगा कौन?

एसटी का दरजा—जन्म से उनका काम!

ज़मीन का कागज-उन्ही की विरासत,

पसुन-पचास रुपिया—उन्हीं की मेहनत।

आज भारत सुने, असम बोले ज़ोर से,

आदिवासियों को अधिकार—फैसला हो तोर से!

जय आई असम... जय आदिवासी...

जिंदाबाद...आशा आशा जिंदाबाद!

आज आवाज़ उठी, कल फैसला होगा,

आदिवासियों का हक-पूरा होगा।

असम की चाय का हर कतरा बोले,

हम जिंदा हैं, हम शुद्ध हैं, हम तोले।

ये गाना नहीं—ये उनकी कहानी,

उनकी मेहनत, उनकी धरती, उनकी जवानी।

जय आई असम... जय आदिवासी...

जिंदाबाद... जिंदाबाद...

आशा आशा... जिंदाबाद...

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