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Inspired by Gupta Ji boss of the bosses in waves ki raves

Opens with cosmic soundscapes, tape hiss, and layered atmospheric echoes, then surges into hardstyle techno beats and acid textures fused with afro percussion. Heavy, deep basslines drive complex, multidimensional arrangements. Group chants and energetic, ethereal female vocals blend Hindi-English with raw, raspy rap, rotating between trippy dance/electronic and ambient passages. Each drop is powerful, studio-quality, with artcore-inspired instrumental flourishes and moments of neo-futuristic in

Gupta Ji Boss of the bosses·7:59

Lyrics

आ आ आ

हो ओ ओ

क्या जरूरी है कि वो मुज़रिम ही हो

जिनके हक़ में फैसले नहीं होते...

Gupta ji neon gangster,

No filter, straight answer

City mein beats ka minister,

Rhythm ka power financer.

Portugal ke saaye

Hindi ke rang

Melody mein ghul jaaye

Har ek dhun ke sang

Hawa mein hai beats

Dhadkan bhi synthetic

Sapna bhi yahaan lagta hai magnetic

उससे बिछड़कर यूं जी रहा हूं

साज़-ए-दिल टूट गया

नगमा रूठ गया

तार से तार मिला दे

ओये रब्बा

बिछड़ा यार मिला दे

करदे कुछ ऐसा तू हाल मेरा

आ जाये सुनकर मेरा मसीहा

मेरा मसइहा

उस तक पहुंचें खबर

आ मिलना है अगर

मुझे बीमार बना द

पंख होते तो उड़ आती रे

रसिया हो जालिमा

तुझे दिल का दाग दिखलाती रे

यादों में खोई पहुंची गगन में

पंछी बनके सच्ची लगन में

दूर से देखा मौसम हंसी था

आनेवाले तू ही नहीं था बॉसे

किरनें बनके बाहें फैलाई

आस के बादल पे जाके लहराई

हो किरनें बनके बाहें फैलाई

आस के बादल पे जाके लहराई

झूल चुकी मैं वादे का झूला

झूल चुकी मैं वादे का झूला

तू तो अपना वादा ही भूला

रसिया हो जालिमा

तुझे दिल का दाग दिखलाती रे

पंख होते तो उड़ आती रे

रसिया हो जालिमा

तुझे दिल का दाग दिखलाती रे

पंख होते तो उड़ आती रे

रसिया हो जालिमा

तुझे दिल का दाग दिखलाती रे

पंख होते तो उड़ आती रे

कहीं दूर जब दिन ढल जाए

साँझ की दुल्हन बदन चुराए

चुपके से आए

मेरे ख़यालों के आँगन में

कोई सपनों के दीप जलाए, दीप जलाए

कहीं दूर जब दिन ढल जाए

साँझ की दुल्हन बदन चुराए

चुपके से आए

कभी यूँहीं, जब हुईं, बोझल साँसें

भर आई बैठे बैठे, जब यूँ ही आँखें

कभी यूँहीं, जब हुईं, बोझल साँसें

भर आई बैठे बैठे, जब यूँ ही आँखें

तभी मचल के, प्यार से चल के

छुए कोई मुझे पर नज़र न आए, नज़र न आए

कहीं दूर जब दिन ढल जाए

साँझ की दुल्हन बदन चुराए

चुपके से आए

कहीं तो ये, दिल कभी, मिल नहीं पाते

कहीं से निकल आए, जनमों के नाते

कहीं तो ये, दिल कभी, मिल नहीं पाते

कहीं से निकल आए, जनमों के नाते

घनी थी उलझन, बैरी अपना मन

अपना ही होके सहे दर्द पराये, दर्द पराये

कहीं दूर जब दिन ढल जाए

साँझ की दुल्हन बदन चुराए

चुपके से आए

दिल जाने, मेरे सारे, भेद ये गहरे

खो गए कैसे मेरे, सपने सुनहरे

दिल जाने, मेरे सारे, भेद ये गहरे

खो गए कैसे मेरे, सपने सुनहरे

ये मेरे सपने, यही तो हैं अपने

मुझसे जुदा न होंगे इनके ये साये, इनके ये साये

कहीं दूर जब दिन ढल जाए

साँझ की दुल्हन बदन चुराए

चुपके से आए

मेरे ख़यालों के आँगन में

कोई सपनों के दीप जलाए, दीप जलाए

कहीं दूर जब दिन ढल जाए

साँझ की दुल्हन बदन चुराए

चुपके से आए

ना ख्वाइश ए मंजिल, ना इश्क़ ए मिसाल

है तू...

मुझमे ही उलझा मेरा ही एक सवाल हैं

तू..

ना राहत ए मर्ज ना दर्द ए इलाज है तू...

फिर क्यों मेरी जिंदगी की रुह ए तलाश है

तू

दिल से रोते हैं लोग

मोहब्बत कि आग में गुप्ता साहेब

ज़िन्दगी जन्नत हो जाती...

इतने आँसू अगर इबादत में बहा देते...!!

ये इनायतें ग़ज़ब की ये बला की मेहरबानी

मेरी ख़ैरियत भी पूछी किसी और की ज़बानी

नहीं मुझ से जब तअल्लुक़ तो ख़फ़ा ख़फ़ा से क्यूँ हैं

नहीं जब मिरी मोहब्बत तो ये कैसी बद-गुमानी

मिरा ग़म रुला चुका है तुझे बिखरी ज़ुल्फ़ वाले

ये घटा बता रही है कि बरस चुका है पानी

तिरा हुस्न सो रहा था मिरी छेड़ ने जगाया

वो निगाह मैं ने डाली कि सँवर गई जवानी

मिरी बे-ज़बान आँखों से गिरे हैं चंद क़तरे

वो समझ सकें तो आँसू न समझ सकें तो पानी

है अगर हसीं बनाना तुझे अपनी ज़िंदगी को

तो गुप्ता साहेब इस जहाँ को न समझ जहान-ए-फ़ानी

सीना तान के चलो मेरे दोस्त एई खान विशाल दानी

मुझे हक़ीर न समझें हवस के कारिंदे,

मेरे मिज़ाज में गर ख़ुदसरी नहीं मिलती

मैं एक क़तरा हूँ लेकिन वहां का ख़ादिम हूँ,

समन्दरों को जहाँ नौकरी नहीं मिलती!

कोई दिखा के रोए तो कोई छुपा के रोए

हमें रुलाने वाले हमें रुला के रोए,

मरने का मज़ा तो तब हैं ग़ालिब गुप्ता साहेब

ज़ब क़ातिल जनाजे पर आकर रोए..!!

मेरी तरह ज़रा भी तमाशा किए बग़ैर

रो कर दिखाओ आँख को गीला किए बग़ैर

ग़ैरत ने हसरतो का गरेबाँ पकड़ लिया

हम लौट आए अर्ज़-ए-तमन्ना किए बग़ैर

चेहरा हज़ार बार बदल लीजिए मगर

माज़ी तो छोड़ता नहीं पीछा किए बग़ैर

कुछ दोस्तों के दिल पे तो छुरियाँ सी चल गईं

की उस ने मुझ से बात जो पर्दा किए बग़ैर

यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे

मैं समझता था मेरे यार समझते हैं मुझे।

कमी नहीं मिलेगी कभी आपको हमारे किरदार में,

चलेंगे एक दिन यह भी खोटे सिक्के बाजार में हम बुज़ुर्गों पर दुआओं के सिवा कुछ भी नहीं

ख़ुश रहे वो भी, जो कहते हैं दुआ कुछ भी नहीं

बूंद में अटकी हवा है, बुलबुला कुछ भी नहीं

किस क़दर मग़रूर है, जैसे ख़ुदा कुछ भी नहीं

हम किसी के ऐब का सागर खंगालें किसलिए

आज तक इन ग़ोताखोरों को मिला कुछ भी नहीं

मुठ्ठी बांधे आए थे हम, मुठ्ठी खोले जाएंगे

य समझ लो तो समझने को बचा कुछ भी नहीं

हौसला, पक्का, इरादा और मंज़िल का जुनूँ

इनके आगे मुश्किलों का सिलसिला कुछ भी नहीं

आपको जाना है आगे अपनी मंज़िल की तरफ

पीछे मुड़ कर देखने से फायदा कुछ भी नहीं

मानने को कोई माने अपने को भगवान सम

असलियत में आदमियत से बड़ा कुछ भी नहीं

होने को लुकमान जैसे हो गए कितने हक़ीम

मग़रुरियत के मर्ज़ की लेकिन दवा कुछ भी नहीं

आंखों में अपनी आस लिए बेकरार लोग,

करते हैं किसका शाम ढले इंतजार लोग।

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